बदलाव.......
सभी दलों से दलित पिछड़े खींचे चले आयेंगे जो नहीं आये तो जनता उन्हें धकेल कर किनारे कर देगी .
बदलाव के प्रासेस में स्वाभाविक है मेरी बात नेताओं को भी ठीक न लगे पर है ये जरूरी, इसे आम आदमी से लेकर सारे बुद्धिजीवी पसंद करेंगे .
आइये इन्हें लागू कराने के लिए एकजूट हों
और नेत्रित्व को तैयार करें .
अखिलेश यादव मंचों से चिल्ला-चिल्लाकर 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का राग अलापते हैं।
शाहिद नक़वी की पोस्ट से यह बात आकर्षित की कि क्या अखिलेश यादव जी अमर सिंह को अपना राजनितिक गुरु मानते हैं या समाजवाद की यह पुरानी परिपाटी है ?
समाजवादी पार्टी का समाजवाद और कॉर्पोरटे के सम्बन्ध पर दृष्टि डालें तो अनेक उदाहरण मौजूद हैं , क्या अखिलेश यादव इस विचारधारा पर समझ रखते हैं और इसका कोई प्रयोग करने का इरादा रखते हैं। यह इस समय की गंभीर चिंता है जिसको लोगों को बेहद चिंतित करता है जिसे कुछ लोगों के विचार साझा कर रहा हूँ -
समाजवाद और कॉर्पोरेटवाद दो अलग आर्थिक-राजनीतिक दृष्टिकोण हैं।
समाजवाद (Socialism) का मूल विचार है कि उत्पादन के प्रमुख साधन, संसाधन और महत्वपूर्ण उद्योग समाज या राज्य के नियंत्रण में हों, ताकि संपत्ति और अवसरों का अपेक्षाकृत समान वितरण हो सके। इसका लक्ष्य सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और जनकल्याण है।
कॉर्पोरेटवाद (Corporatism/Corporate Capitalism) में बड़ी कंपनियां और व्यापारिक संस्थाएं अर्थव्यवस्था तथा कभी-कभी नीति-निर्माण पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव रखती हैं। इसमें निजी स्वामित्व, लाभ कमाना और बाजार आधारित गतिविधियां प्रमुख होती हैं।
मुख्य अंतर
समाजवाद
कॉर्पोरेटवाद
समानता पर बल
लाभ और पूंजी पर बल
सार्वजनिक/सामूहिक स्वामित्व
निजी स्वामित्व
राज्य की बड़ी भूमिका
कंपनियों की बड़ी भूमिका
सामाजिक कल्याण प्राथमिक
प्रतिस्पर्धा और मुनाफा प्राथमिक
आलोचनाएं
समाजवाद की आलोचना यह कहकर की जाती है कि इससे नवाचार और प्रतिस्पर्धा कम हो सकती है।
कॉर्पोरेटवाद की आलोचना यह है कि इससे आर्थिक असमानता बढ़ सकती है और बड़ी कंपनियां राजनीति को प्रभावित कर सकती हैं।
व्यवहार में अधिकांश आधुनिक देश शुद्ध समाजवाद या शुद्ध कॉर्पोरेटवाद का पालन नहीं करते, बल्कि दोनों के कुछ तत्वों को मिलाकर मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाते हैं।
भारतीय राजनीति के संदर्भ में समाजवाद और कॉर्पोरेट राजनीति के संबंध
भारतीय राजनीति में समाजवाद और कॉर्पोरेट राजनीति का संबंध आज सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक बहसों में से एक है। यह संबंध अक्सर सहयोग, संघर्ष और संतुलन, तीनों रूपों में दिखाई देता है।
1. समाजवाद का मूल दृष्टिकोण समाजवाद मानता है कि राज्य की नीतियाँ मुख्यतः किसानों, मजदूरों, गरीबों और कमजोर वर्गों के हित में बननी चाहिए। इस विचारधारा के अनुसार आर्थिक संसाधनों और अवसरों का अत्यधिक संकेंद्रण कुछ बड़े उद्योगपतियों या कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में नहीं होना चाहिए।
2. कॉर्पोरेट राजनीति क्या है ? कॉर्पोरेट राजनीति से आशय उस स्थिति से है जब बड़े उद्योग समूह, व्यापारिक हित और कॉर्पोरेट संस्थान सरकारी नीतियों, चुनावी वित्तपोषण या निर्णय-प्रक्रिया को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसके समर्थकों का तर्क है कि उद्योग और निवेश के बिना आर्थिक विकास संभव नहीं है।
3. टकराव के प्रमुख मुद्दे भूमि अधिग्रहण
समाजवादी दल किसानों की सहमति और उचित मुआवजे पर जोर देते हैं। कॉर्पोरेट समर्थक दृष्टिकोण उद्योगों, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर और बुनियादी ढाँचे के लिए भूमि उपलब्ध कराने को आवश्यक मानता है। श्रम कानून समाजवादी विचारधारा श्रमिक सुरक्षा, यूनियन अधिकार और स्थायी रोजगार को महत्व देती है। कॉर्पोरेट क्षेत्र श्रम कानूनों को सरल बनाने और नियुक्ति-हटाने में अधिक लचीलापन चाहता है। निजीकरण समाजवादी विचार सार्वजनिक उपक्रमों को राष्ट्रीय संपत्ति मानता है। कॉर्पोरेट समर्थक विचार निजीकरण को दक्षता और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का साधन मानता है।
4. भारतीय राजनीति में व्यावहारिक स्थिति रोचक तथ्य यह है कि आज लगभग सभी बड़े राजनीतिक दल समाजवादी और बाजारवादी नीतियों का मिश्रण अपनाते हैं। उदाहरण: मुफ्त राशन, मनरेगा, किसान सम्मान निधि, आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ समाजवादी प्रवृत्ति को दर्शाती हैं। निजी निवेश, स्टार्टअप प्रोत्साहन, विनिवेश, औद्योगिक कॉरिडोर और विदेशी निवेश को बढ़ावा देना बाजारवादी या कॉर्पोरेट-समर्थक नीतियों का उदाहरण है।
5. आलोचना समाजवादी चिंतकों का आरोप रहता है कि: जब सरकार और बड़े कॉर्पोरेट समूहों के संबंध बहुत निकट हो जाते हैं, तो नीति निर्माण में आम जनता की अपेक्षा पूँजी के हितों को अधिक प्राथमिकता मिलने लगती है। वहीं कॉर्पोरेट समर्थक अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि: यदि उद्योग और निवेश को प्रोत्साहन नहीं मिलेगा, तो रोजगार, आय और कर संग्रह नहीं बढ़ेगा, जिससे कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधन भी नहीं मिलेंगे।
निष्कर्ष ; भारतीय राजनीति में समाजवाद और कॉर्पोरेट राजनीति का संबंध पूर्ण विरोध का नहीं, बल्कि संतुलन की खोज का है। मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि उद्योग होने चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि: क्या आर्थिक विकास का लाभ किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों तक समान रूप से पहुँच रहा है, या उसका बड़ा हिस्सा कुछ चुनिंदा कॉर्पोरेट समूहों तक सीमित रह जा रहा है? यही प्रश्न भारतीय लोकतंत्र में समाजवाद बनाम कॉर्पोरेट राजनीति की बहस का केंद्र है।
लोहिया के समाजवाद पर कार्पोरेट का कब्जा??? - शाहिद नक़वी @highlight
पीडीए में ए का वजूद अब कहां है कयों कि लोहिया के समाजवाद पर 'कॉर्पोरेट' का कब्जा हो गया है।सपा में राज्यसभा चुनाव में परिवारवाद और कार्पोरेट को मिली तवज्जो के बाद मेरा समाजवादी झंडा बुलंद करने वाले मुस्लिम नेताओं से सवाल है कि वह अब क्या करेंगे।साल 22 के विधानसभा चुनावों में मुसलमानों ने ही अपना सपा को 79 प्रतिशत वोट देकर उत्तर प्रदेश की राजनीतिक लड़ाई में बनाए रखा है। इसी भारी समर्थन के दम पर सपा मुख्य विपक्षी दल बनी रही, लेकिन जब इस वफादारी के बदले प्रतिनिधित्व देने का समय आया, तो राज्यसभा की रेस से मुस्लिमों का पत्ता पूरी तरह साफ कर दिया गया। अखिलेश यादव मंचों से चिल्ला-चिल्लाकर 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का राग अलापते हैं। लेकिन राज्यसभा के इन टिकटों ने साबित कर दिया है कि इस नारे में 'A' यानी अल्पसंख्यक (Minority) सिर्फ एक दिखावा है।
अगर ऐसा नहीं है तो जब राज्यसभा जैसी सुरक्षित सीटों के जरिए संसद में अल्पसंख्यकों की आवाज बुलंद करने वाले कद्दावर नेताओं को भेजने की बारी आती है, तो अखिलेश यादव को ज़मीनी नेताओं के बजाय धनराज नथवानी जैसे कॉर्पोरेट चेहरे ज्यादा मुफीद क्यों लगते हैं।सपा नेतृत्व शायद इस मुगालते में जी रहा है कि मुसलमानों के पास भाजपा के डर के कारण कोई दूसरा विकल्प नहीं है और वे मजबूरी में सपा को ही वोट देंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब किसी कौम या समुदाय के आत्मसम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लगातार कुचला जाता है, तो वह विकल्प तलाश ही लेता है। सवाल ये भी है कि मुसलमानों ने सपा को थोक में वोट दिया तो क्या मिला।सपा के मुस्लिम नेताओं को ये सोचना है कि उन्हें क्या करना है। सपा के साथ गठबंधन करके हो सकता है कि कांग्रेस को भी नुकसान उठाना पड़े। इसे किसी के समर्थन या विरोध में न माना जाए।
@highlight
अखिलेश की गैरमौजूदगी के पीछे क्या है बड़ी रणनीति? | श्रवण गर्ग #harkara
30 सितंबर को हुई INDIA गठबंधन की बैठक में अखिलेश यादव की गैरमौजूदगी ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के रिश्तों पर नए सवाल खड़े किए हैं. क्या यह महज़ सीट बंटवारे का विवाद है, या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम आकार ले रहा है?
हरकारा डीप डाइव के इस विशेष एपिसोड में निधीश त्यागी वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग के साथ चर्चा कर रहे हैं कि अखिलेश यादव का बैठक से दूर रहना विपक्षी एकता, उत्तर प्रदेश की राजनीति और राष्ट्रीय राजनीतिक समीकरणों के लिए क्या संकेत देता है. बातचीत में समाजवादी पार्टी के राज्यसभा फैसले, कांग्रेस-सपा के बीच सीटों की खींचतान, संभावित मध्यावधि चुनाव, ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ और उत्तर प्रदेश की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका जैसे मुद्दे शामिल हैं.
क्या उत्तर प्रदेश में कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव होने वाला है? सुनिए श्रवण गर्ग का विश्लेषण और उनकी आशंकाएं, हरकारा डीप डाइव में.
पूंजीपति और समाजवाद??
परिमल नाथवानी अम्बानी परिवार का बहुत पुराना liaison officer है। अम्बानी गुजराती व्यापारी है स्व अमर सिंह के कारण नेता जी मुलायम सिंह यादव जी से अम्बानी परिवार के सम्बन्ध जुड़ गए थे..
👉तब से ये सम्बन्ध है लेकिन ये गुजराती व्यापारी अखिलेश यादव से अधिक मोदी के आदमी हैं.!
सपा ने राज्य सभा में नाथवानी के बेटे को टिकट देकर कोई बहुत बड़ा गेम नहीं खेला है।
👉समाजवादी विचारधारा वालों को पूंजीपतियों के मैनेजर को टिकट देना पूंजीवाद के आगे झुकना ही है जो कि बिल्कुल ग़लत लगता है.!
👉क्या अखिलेश जी को कोई बेहतर संघर्षशील बुद्धिजीवी और योग्य आदमी नहीं मिला जो अम्बानी जैसे पूंजीपति के नौकर के बेटे को राज्यसभा भेजना पड़ रहा है.!
👉बाप बीजेपी की तरफ से राज्यसभा में सदस्य हैं और बेटा समाजवादी पार्टी की तरफ से राज्यसभा में भेजा जा रहा है -- समाजवादी पार्टी को एक पूंजीपतियों से सम्बंधित आदमी को राज्यसभा में क्यों भेजना पड़ रहा है -ये कदम सपा के निर्णय को संदेहास्पद बनाता है।
जो भी है समाजवादी पार्टी के लिए ये सराहनीय निर्णय नहीं है.!
Courtesy Anupama Yadav ma'am (काव्या यादव की वाल से......)
समाजवाद के नाम पर सत्ता की राजनीति:
समाजवादी पार्टी का कॉरपोरेट से रिश्ता और पिछड़ों की राजनीति
- सुभाष चंद्र कुशवाहा
समाजवादी पार्टी के नाम में समाजवाद है। उसके राजनीतिक इतिहास में लोहिया, जयप्रकाश, किसान, पिछड़े और सामाजिक न्याय की विरासत का दावा भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सत्ता और संसदीय राजनीति में उसकी कार्यशैली भी उसी समाजवादी परंपरा के अनुरूप रही है?
आज यह सवाल इसलिए फिर सामने आया है क्योंकि समाजवादी पार्टी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े धनराज परिमल नाथवानी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया है। नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज के ग्रुप प्रेसिडेंट हैं और रिलायंस न्यू एनर्जी लिमिटेड के बोर्ड में निदेशक भी हैं। उनके पिता परिमल नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज में कॉरपोरेट अफेयर्स के प्रमुख हैं। 30 सितंबर 2026 को नाथवानी ने सपा उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया।
यह कोई बिल्कुल नया प्रयोग भी नहीं है।
मुलायम सिंह यादव के दौर में अमर सिंह सपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में रहे। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, अमर सिंह ने सपा के कॉरपोरेट और बॉलीवुड जगत से संपर्क मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1990 के दशक के अंत में उनके आने के साथ पार्टी की राजनीति में कॉरपोरेट और बॉलीवुड का प्रभाव दिखाई देने लगा।
2016 में मुलायम सिंह यादव ने अमर सिंह को फिर सपा से राज्यसभा भेजा। उसी सूची में कारोबारी और बिल्डर संजय सेठ भी थे। सेठ शालीमार कॉर्प लिमिटेड के प्रबंध निदेशक थे और उनकी कंपनियों को सरकारी परियोजनाएँ भी मिली थीं।
इससे पहले 2004 में अनिल अंबानी सपा के समर्थन से उत्तर प्रदेश से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुँचे थे। 2006 में ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ विवाद के बीच उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दिया।
और बात केवल राज्यसभा तक सीमित नहीं थी। मुलायम सरकार के समय अनिल अंबानी के दादरी बिजली संयंत्र के लिए जमीन अधिग्रहण का मामला भी विवाद में आया। Economic Times के अनुसार, लगभग 2,500 एकड़ जमीन सरकार ने ‘पब्लिक पर्पज’ का हवाला देते हुए अधिग्रहित की थी। बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए जमीन लौटाने का निर्देश दिया।
इस पूरे इतिहास को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या समाजवादी राजनीति और बड़े कॉरपोरेट घरानों के साथ सत्ता-संबंधों के बीच कोई तनाव नहीं था?
अखिलेश यादव को भी इस प्रश्न से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।
2012 में मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने उद्योगपतियों को उत्तर प्रदेश में निवेश के लिए आमंत्रित करने की बात कही थी। 2011 में Economic Times को उन्होंने कहा था कि सत्ता में आने पर वे अनिल और मुकेश अंबानी सहित बड़े उद्योगपतियों तथा टाटा आदि को उत्तर प्रदेश में निवेश के लिए लाना चाहेंगे और “corporate help” का इस्तेमाल उन क्षेत्रों में करेंगे, जहाँ उसकी जरूरत हो।
इसका अर्थ यह नहीं कि उद्योग में निवेश बुलाना अपने-आप में समाजवाद-विरोधी नीति है। आधुनिक समाजवादी पार्टियाँ भी निजी निवेश और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीतियाँ अपना सकती हैं। असल सवाल यह है कि सरकार और बड़े पूंजीगत हितों के बीच संबंधों में सार्वजनिक हित, श्रमिक अधिकार, भूमि-अधिग्रहण और सामाजिक न्याय को कितनी प्राथमिकता मिलती है।
यहीं से आज के नाथवानी प्रकरण का राजनीतिक अर्थ निकलता है।
सपा आज PDA—पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक—की राजनीति को अपना प्रमुख आधार बना रही है। ऐसे समय में रिलायंस से जुड़े व्यक्ति को राज्यसभा भेजना स्वाभाविक रूप से यह सवाल पैदा करता है कि पार्टी का सामाजिक न्याय का नारा और उसकी संसदीय प्रतिनिधित्व की पसंद आपस में कितने मेल खाते हैं।
पिछड़ों की राजनीति: आंदोलन या चुनावी रणनीति?
सपा की दूसरी बड़ी परीक्षा ओबीसी राजनीति है। आज ओबीसी के तमाम नेता, जैसे ओमप्रकाश राजभर, संजय निषाद, अनुप्रिया पटेल, केशवप्रसाद मौर्य, आदि ओबीसी हितों के विरुद्ध काम कर रहे हैं तब सपा की PDA राजनीति से अपेक्षाएँ बढ़ जाती हैं।
अखिलेश यादव ने PDA के जरिए गैर-यादव पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों तक पार्टी का आधार बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन 2024 में ही इंडियन एक्सप्रेस ने पार्टी के भीतर और बाहर उठ रहे उन सवालों की चर्चा की थी कि अन्य ओबीसी को मुख्य पदों पर तथा पारिवारिक परिधि से बाहर जाकर, विचारधारा के आधार पर योग्य उम्मीदवारों को आगे बढ़ाने का प्रयास अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। दूसरी ओर, धर्मांधता और पुरातनपंथी विचारों को लेकर भी अखिलेश यादव की समाजवादी विचारधारा की आलोचना होती रही है।
2026 में पार्टी ने “PDA आरक्षण ऑडिट” अभियान शुरू किया और सरकारी नौकरियों में पिछड़ों तथा दलितों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया। 69,000 शिक्षक भर्ती विवाद से जुड़े आंदोलनों को भी सपा ने अपने आरक्षण अभियान से जोड़ा।
लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि क्या वह इन सवालों को लेकर वैसा व्यापक सामाजिक आंदोलन चला पाई है, जैसा मंडल के दौर में पिछड़े वर्गों की राजनीति ने दिखाया था?
यहीं पर समाजवादी पार्टी की राजनीतिक प्रतिबद्धता पर बहस हो सकती है।
सड़क पर संघर्ष बनाम संसद की राजनीति
2020 में सपा ने बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदेशव्यापी प्रदर्शन किए थे और पुलिस कार्रवाई का सामना भी किया था।
2026 में भी अखिलेश यादव ने संसद में छात्रों पर कार्रवाई और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे उठाए।
सितंबर 2026 में गोंडा के निषाद युवक विनोद साहनी की हत्या के बाद सपा नेताओं ने विरोध प्रदर्शन में भाग लिया और पीड़ित परिवार के पक्ष में हस्तक्षेप किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या सपा के आंदोलनों में जिस निरंतरता और प्रतिबद्धता की जरूरत है, वह दिखाई देती है? चुनाव की तत्काल जरूरतों से आगे जाकर स्थायी वैचारिकी के साथ संघर्ष करने में वह कोताही बरतती नजर आती है।
समाजवाद की असली कसौटी
समाजवाद केवल पार्टी के नाम में नहीं होता। वह इस बात से दिखाई देता है कि—
• जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर किसका अधिकार हो;
• सार्वजनिक संस्थानों का निजीकरण किस सीमा तक हो;
• श्रमिकों और किसानों के अधिकारों की रक्षा कैसे हो;
• सरकारी नौकरियों में पिछड़ों, दलितों और वंचितों का प्रतिनिधित्व कितना हो;
• बड़े कॉरपोरेट और सरकार के संबंध कितने पारदर्शी हों;
• और जब सामाजिक न्याय का प्रश्न उठे तो पार्टी संसद में बयान देती है या सड़क पर लंबे संघर्ष का नेतृत्व भी करती है।
सपा के इतिहास में लोहियावादी सामाजिक न्याय और बड़े पूंजीगत हितों से नजदीकी—दोनों धाराएँ दिखाई देती हैं। अमर सिंह का दौर, अनिल अंबानी को राज्यसभा भेजना, ललित सूरी और संजय सेठ जैसे कारोबारी चेहरों का सपा समर्थन पाना और अब रिलायंस से जुड़े धनराज नाथवानी को राज्यसभा भेजना इस इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं।
इसलिए आज सवाल केवल यह नहीं है कि समाजवादी पार्टी समाजवादी है या नहीं।
ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है—
जिस समाजवाद के नाम पर वोट माँगा जाता है, क्या वही समाजवाद पार्टी के आर्थिक फैसलों, संसदीय प्रतिनिधित्व और सड़क के संघर्षों में भी दिखाई देता है? यही सवाल सपा से उसके अपने इतिहास के आधार पर पूछा जाना चाहिए। रामपुर के कद्दावर नेता, आज़म खान के मामले में सपा नेता की सुविधापरस्त विरोध की नीतियों ने यही साबित किया है।
SIR और ज्ञानेश कुमार के मामले में अखिलेश की भूमिका
यह सही है कि अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है और मार्च 2026 में उन्हें हटाने के प्रस्ताव का समर्थन भी किया था। सितंबर में उन्होंने कहा कि मौजूदा CEC के रहते भविष्य के चुनाव नहीं होने चाहिए।
लेकिन बयान देना अलग बात है, आज के दौर में आंदोलन की सड़क पर अगुवाई करना अलग बात है। यहीं पर बयानों की परीक्षा की जरूरत दिखाई देती है।
एक तस्वीर यह है कि 30 सितंबर की INDIA ब्लॉक बैठक में, जिसमें SIR और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ संयुक्त आंदोलन की रणनीति तय होनी थी, अखिलेश यादव स्वयं उपस्थित नहीं हुए। उन्होंने अपने प्रतिनिधि भेजे। रिपोर्टों के अनुसार, उस समय उनका ध्यान उत्तर प्रदेश में राज्यसभा नामांकन और पार्टी के किसान सम्मेलन पर था।
इसके विपरीत, INDIA ब्लॉक ने 2 से 8 अक्टूबर तक जिलों में “Save Democracy March”, 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग तक विपक्षी सांसदों का मार्च और 1 नवंबर को दिल्ली में बड़ी रैली का कार्यक्रम घोषित किया। अब यहीं बहुत कुछ जल्द साफ होगा। इसलिए इस पर अभी कोई अंतिम टिप्पणी करने के बजाय इंतजार करना होगा।
अखिलेश यादव SIR के विरोध में बयान दे रहे हैं और संसदीय कार्रवाई का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन उपलब्ध ताजा रिपोर्टों के आधार पर वे इस समय इसके सबसे प्रमुख सड़क-आंदोलनकारी चेहरे के रूप में सामने नहीं हैं।
सत्ता से निकटता के सवाल
समाजवादी पार्टी से जुड़े शीर्ष राजनीतिक परिवारों के कारोबारी रिश्तों और सत्ता-संरचना से निकटता पर सवाल कोई नया आरोप नहीं है। रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव के मामले में N.M. Buildwell और यादव सिंह प्रकरण का दस्तावेजीकृत संबंध सामने आया है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि परिवार की यह कड़ी, सपा के लिए भारी पड़ी है।राजनीतिक परिवारों के कारोबारी रिश्ते, सत्ता के प्रभावशाली लोगों से उनकी निकटता और सार्वजनिक नीतियों के बीच संबंधों की पारदर्शिता लोकतांत्रिक राजनीति में लगातार जांचे जाने चाहिए।
अखिलेश यादव का INDIA ब्लॉक की उस बैठक में उपस्थित न होना, जिसमें संयुक्त सड़क-आंदोलन की रणनीति बनाई गई और उनकी जगह प्रतिनिधि भेजा जाना, सुविधापरस्त राजनीति के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन अंतिम निष्कर्ष आने वाले दिनों के उनके राजनीतिक व्यवहार से ही निकलेगा।
अब सपा का भविष्य कैसा होगा? क्या वह मुख्य विपक्षी पार्टी की जिम्मेदारियों को निभाएगी या फिर धीरे-धीरे बीएसपी की राह अपनाते हुए किनारे हो जाएगी—उत्तर अभी मिलना बाकी है।
उसके कार्यकर्ताओं की भारी संख्या जिस पहलकदमी की अपेक्षा कर रही है, वह पूरी होगी या नहीं, यह प्रश्न भी जल्द स्पष्ट हो जाना चाहिए। अन्यथा क्षेत्रीय दलों के भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े होंगे।
#SP #Samajwadi #इंडिया
(कुशवाहा जी की फेसबुक वाल से साभार )
वरिष्ठ पत्रकार Urmilesh का विश्लेषण :
INDIA Alliance की बैठक ने सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के कथित वोट चोरी के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चलाने का कार्यक्रम किया है. लेकिन एलायंस की अन्य कई पार्टियां, कांग्रेस या लेफ्ट पार्टियों की तरह ‘वोट-चोरी’ के खिलाफ उतने शिद्दत से लडने का इरादा नहीं दिखा रही हैं! क्या राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन का यह अभियान कामयाब होगा? वरिष्ठ पत्रकार Urmilesh का विश्लेषण :
2 अक्टूबर 2026 से शुरू हुए चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्षी आंदोलन की बात हैं, तो उपलब्ध समाचारों के अनुसार INDIA गठबंधन के दलों ने 2 से 8 अक्टूबर तक जिला मुख्यालयों/डीएम कार्यालयों के बाहर विरोध प्रदर्शन करने का कार्यक्रम घोषित किया था। इसमें गठबंधन की प्रमुख पार्टियों में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भी शामिल है। आंदोलन का मुख्य मुद्दा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से जुड़े प्रश्न बताए गए हैं।
हालांकि, जिन स्रोतों को मैंने देखा, उनमें समाजवादी पार्टी की अलग और विशिष्ट भूमिका (जैसे कितने कार्यकर्ता, कौन-सा नेतृत्व, कौन-सा विशेष कार्यक्रम) का विस्तृत विवरण नहीं मिला। स्रोत केवल यह बताते हैं कि यह INDIA गठबंधन का संयुक्त विरोध कार्यक्रम था।
राजनीतिक दृष्टि से समाजवादी पार्टी की भागीदारी को उसके पारंपरिक समाजवादी रुख से भी जोड़ा जा रहा है, जिसमें वह लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही, सामाजिक प्रतिनिधित्व और विपक्षी एकजुटता जैसे मुद्दों को उठाती रही है। यह विश्लेषण है, समाचार स्रोत का प्रत्यक्ष दावा नहीं।
2 अक्टूबर 2026 के लखनऊ प्रदर्शन में समाजवादी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता और पदाधिकारी अग्रिम पंक्ति में दिखाई दिए, लेकिन अधिकांश समाचारों में सभी नेताओं के नाम विस्तार से नहीं दिए गए हैं। जो बातें स्पष्ट रूप से सामने आती हैं:
सपा कार्यकर्ताओं ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हजरतगंज और आसपास के क्षेत्रों में प्रदर्शन किया।
प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी की गई और पुलिस ने कई सपा कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया।
यह आंदोलन INDIA गठबंधन के राष्ट्रव्यापी अभियान का हिस्सा था, जिसमें समाजवादी पार्टी भी शामिल थी।
अखिलेश यादव की पार्टी ने आंदोलन का समर्थन किया, लेकिन जिन रिपोर्टों का मैंने अध्ययन किया उनमें 2 अक्टूबर को लखनऊ में उनकी प्रत्यक्ष उपस्थिति का उल्लेख नहीं मिला। INDIA गठबंधन की 30 सितंबर की बैठक में भी सपा का प्रतिनिधित्व अन्य सांसदों ने किया था।
इसलिए तथ्यात्मक रूप से कहा जा सकता है कि लखनऊ के प्रदर्शन में सपा नेताओं की भूमिका आंदोलन के संगठन, कार्यकर्ताओं की लामबंदी, विरोध प्रदर्शन और गिरफ्तारी देने की रही, लेकिन उपलब्ध स्रोत इस विशेष दिन के लिए प्रमुख सपा नेताओं की विस्तृत नामवार सूची प्रदान नहीं करते।
भारतीय राजनीति में अखिलेश यादव की जगह एक प्रमुख विपक्षी नेता और उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक की है।
उनकी राजनीतिक स्थिति को इस तरह समझा जा सकता है:
अखिलेश यादवसमाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जो उत्तर प्रदेश की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों में से एक है।
वे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इसलिए उनके पास प्रशासनिक अनुभव भी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में SP ने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया, जिससे अखिलेश यादव की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका और मजबूत हुई। INDIA गठबंधन में भी वे प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। [deccanherald.com], [thehindu.com]
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य है। इसलिए यहां मजबूत जनाधार रखने वाला नेता राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
वर्तमान में वे भाजपा के खिलाफ विपक्षी राजनीति के प्रमुख नेताओं में से हैं, साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के लिए भी महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। [deccanherald.com], [socialnews.xyz]
निष्पक्ष राजनीतिक आकलन में कहा जा सकता है कि अखिलेश यादव आज:
उत्तर प्रदेश में शीर्ष विपक्षी नेताओं में हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख विपक्षी चेहरों में शामिल हैं।
भविष्य में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की चर्चाओं में कभी-कभी उनका नाम लिया जाता है, लेकिन वर्तमान समय में वे मुख्यतः उत्तर प्रदेश की राजनीति पर केंद्रित दिखाई देते हैं।
कुल मिलाकर, उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उत्तर प्रदेश में उनका जनाधार है, और वही उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली बनाता है।
अखिलेश यादव की राष्ट्रीय भूमिका को समझने के लिए उनकी ताकत, सीमाएँ और राजनीतिक महत्व तीनों को देखना होगा।
1. राष्ट्रीय राजनीति में उनकी ताकत
अखिलेश यादव भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के प्रमुख विपक्षी नेता हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति राष्ट्रीय सत्ता को प्रभावित करती है, इसलिए उनका प्रभाव राज्य से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर तक जाता है।
समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भले कांग्रेस या भाजपा जैसी सर्वव्यापी पार्टी न हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में उसका मजबूत जनाधार उसे राष्ट्रीय गठबंधनों में महत्वपूर्ण बनाता है।
INDIA गठबंधन में वे उन नेताओं में गिने जाते हैं जिनके पास वास्तविक वोट आधार और संगठन दोनों हैं। [deccanherald.com], [thehindu.com]
2. विपक्षी राजनीति में उनकी भूमिका
वे भाजपा विरोधी राजनीति के प्रमुख चेहरों में हैं।
उनकी राजनीति सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक समूहों के प्रतिनिधित्व पर आधारित रही है।
हाल के बयानों में उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए रखने की बात कही है, जिससे संकेत मिलता है कि वे विपक्षी एकता को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। [deccanherald.com], [outlookindia.com]
3. उनकी सीमाएँ
उनका मुख्य प्रभाव अभी भी उत्तर प्रदेश तक केंद्रित है।
दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर, पश्चिम भारत या अन्य बड़े राज्यों में उनकी पार्टी का स्वतंत्र प्रभाव सीमित है।
राष्ट्रीय नेतृत्व की दौड़ में उनकी स्थिति मजबूत होने के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश से बाहर भी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ानी होगी।
4. क्या वे राष्ट्रीय नेता हैं?
हाँ, लेकिन उनकी श्रेणी को "क्षेत्रीय आधार वाले राष्ट्रीय नेता" कहना अधिक उचित होगा।
उन्हें उसी समूह में रखा जा सकता है जिसमें समय-समय पर ममता बनर्जी, एम.के. स्टालिन, उद्धव ठाकरे या तेजस्वी यादव जैसे नेता आते हैं। ये नेता अपने राज्यों में मजबूत हैं और राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते हैं, लेकिन पूरे देश में समान प्रभाव नहीं रखते।
5. भविष्य की संभावनाएँ
यदि:
उत्तर प्रदेश में SP मजबूत प्रदर्शन करती है,
कांग्रेस के साथ गठबंधन सफल रहता है,
और वे विपक्षी एकता में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं,
तो उनकी राष्ट्रीय भूमिका और बढ़ सकती है। वर्तमान स्थिति में उन्हें विपक्ष के प्रमुख रणनीतिक नेताओं में गिना जाता है, लेकिन उन्हें सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता या प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में स्थापित कहना अभी जल्दबाज़ी होगी।
निष्कर्ष:अखिलेश यादव आज भारतीय राजनीति में एक प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विपक्षी नेता हैं। उनकी राष्ट्रीय ताकत का आधार उत्तर प्रदेश है, और वही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी भी है। [deccanherald.com],
किसकी राजनीतिक ताकत अधिक है?
राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी का प्रभाव बड़ा माना जाता है क्योंकि वे कांग्रेस के सबसे प्रमुख नेता हैं और कांग्रेस लगभग पूरे देश में मौजूद है।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की राजनीतिक ताकत अधिक मानी जाती है क्योंकि उनकी पार्टी का संगठन और वोट आधार राज्य में मजबूत है।
विपक्ष में कौन अधिक महत्वपूर्ण?
वर्तमान विपक्षी राजनीति में दोनों की भूमिका अलग है:
राहुल गांधी विपक्ष का राष्ट्रीय चेहरा हैं।
अखिलेश यादव विपक्ष की सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्तियों में से एक हैं।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सफलता काफी हद तक SP के सहयोग पर निर्भर मानी जाती है, जबकि SP को राष्ट्रीय विपक्षी मंच पर कांग्रेस की आवश्यकता रहती है। [deccanherald.com], [newindianexpress.com]
भविष्य की दृष्टि से
यदि उत्तर प्रदेश में SP मजबूत प्रदर्शन करती है, तो अखिलेश यादव की राष्ट्रीय हैसियत और बढ़ सकती है। वहीं राहुल गांधी की ताकत इस बात पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस विभिन्न राज्यों में कितना विस्तार कर पाती है। वर्तमान में राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर पर बड़े नेता हैं, जबकि अखिलेश यादव सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं में से एक हैं। [deccanherald.com], [thehindu.com]
निष्कर्ष: यदि प्रश्न "कौन बड़ा राष्ट्रीय नेता है?" तो उत्तर होगा राहुल गांधी।
यदि प्रश्न "किसके पास अपने राज्य में अधिक प्रत्यक्ष राजनीतिक नियंत्रण और जनाधार है?" तो उत्तर होगा अखिलेश यादव। [outlookindia.com], [thehindu.com]
"कौन बेहतर गठबंधन नेता है?" इसका कोई पूर्णतः वस्तुनिष्ठ उत्तर नहीं है, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप गठबंधन नेतृत्व को कैसे परिभाषित करते हैं।
यदि मानदंड है: विभिन्न दलों को एक मंच पर लाना
तो राहुल गांधी को बढ़त मिलती है, क्योंकि कांग्रेस INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है और अधिकांश विपक्षी दलों के साथ संवाद का केंद्रीय बिंदु भी है। [thehindu.com]
यदि मानदंड है: सीट-समझौते में व्यावहारिक राजनीति
तो अखिलेश यादव मजबूत माने जा सकते हैं। वे क्षेत्रीय दल की राजनीति से आते हैं और सीटों के बंटवारे को "जीतने की क्षमता" के आधार पर देखने की बात करते हैं। हाल के SP-कांग्रेस वार्तालाप में भी उनका रुख काफी व्यावहारिक दिखाई दिया है। [outlookindia.com], [deccanherald.com]
दोनों की शैली में अंतर
राहुल गांधी की शैली वैचारिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित रहती है।
अखिलेश यादव की शैली चुनावी गणित, सामाजिक गठबंधन और राज्य-स्तरीय रणनीति पर अधिक केंद्रित रहती है।
राजनीतिक विश्लेषकों की दृष्टि से
राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट रखने के लिए राहुल गांधी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष: यदि प्रश्न "राष्ट्रीय गठबंधन का चेहरा कौन है?" तो उत्तर राहुल गांधी होगा। यदि प्रश्न "गठबंधन की चुनावी राजनीति और सीट-साझेदारी को कौन बेहतर संभाल सकता है?" तो अखिलेश यादव का दावा मजबूत माना जा सकता है।
इसलिए वर्तमान राजनीति में दोनों की भूमिकाएँ प्रतिस्पर्धी कम और पूरक अधिक हैं।
हाँ, अखिलेश यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी (SP) INDIA (Indian National Developmental Inclusive Alliance) गठबंधन की प्रमुख सहयोगी पार्टियों में शामिल है। हाल के समय में सीट बंटवारे और कुछ राजनीतिक मतभेदों को लेकर SP और कांग्रेस के बीच तनाव की खबरें आई हैं, लेकिन SP अभी भी INDIA गठबंधन का हिस्सा मानी जाती है। [livemint.com], [outlookindia.com], [thenewsmill.com]
संक्षेप में: अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी INDIA गठबंधन में हैं, हालांकि गठबंधन के भीतर सीट-शेयरिंग और नेतृत्व को लेकर समय-समय पर मतभेद सामने आते रहते हैं।[indiatoday.in], [livemint.com]
अखिलेश यादव और कांग्रेस के बीच मुख्य मतभेद राजनीतिक रणनीति और सीट बंटवारे को लेकर रहे हैं, खासकर उत्तर प्रदेश में। हालांकि दोनों दल INDIA गठबंधन के सहयोगी हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उनकी राय अलग रही है। [indiatoday.in], [livemint.com]
मुख्य मतभेद:
सीट शेयरिंग (Seat Sharing): उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस अधिक सीटों की मांग कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी कम सीटें देने के पक्ष में बताई जाती है। [indiatoday.in]
गठबंधन में भूमिका: कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयानों पर अखिलेश यादव ने नाराजगी दिखाई है और इसे दबाव की राजनीति के रूप में देखा गया। [indiatoday.in]
बैठकों में अनुपस्थिति: हाल में अखिलेश यादव का INDIA गठबंधन की एक महत्वपूर्ण बैठक में शामिल न होना भी दोनों दलों के बीच तनाव के संकेत के रूप में देखा गया। हालांकि समाजवादी पार्टी ने गठबंधन से अलग होने की बात नहीं कही। [outlookindia.com], [indiatoday.in]
गठबंधन पर सार्वजनिक बयान: इसके बावजूद अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि INDIA गठबंधन कायम है और उनकी पार्टी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने के पक्ष में है। [timesofind...atimes.com]
संक्षेप में, मतभेद रणनीतिक और चुनावी हैं, वैचारिक या गठबंधन तोड़ने वाले नहीं। फिलहाल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों INDIA गठबंधन का हिस्सा हैं।[timesofind...atimes.com], [thenewsmill.com]
अखिलेश यादव और कांग्रेस के बीच मुख्य मतभेद राजनीतिक रणनीति और सीट बंटवारे को लेकर रहे हैं, खासकर उत्तर प्रदेश में। हालांकि दोनों दल INDIA गठबंधन के सहयोगी हैं, लेकिन कई मुद्दों पर उनकी राय अलग रही है। [indiatoday.in], [livemint.com]
मुख्य मतभेद:
सीट शेयरिंग (Seat Sharing): उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस अधिक सीटों की मांग कर रही है, जबकि समाजवादी पार्टी कम सीटें देने के पक्ष में बताई जाती है। [indiatoday.in]
गठबंधन में भूमिका: कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयानों पर अखिलेश यादव ने नाराजगी दिखाई है और इसे दबाव की राजनीति के रूप में देखा गया। [indiatoday.in]
बैठकों में अनुपस्थिति: हाल में अखिलेश यादव का INDIA गठबंधन की एक महत्वपूर्ण बैठक में शामिल न होना भी दोनों दलों के बीच तनाव के संकेत के रूप में देखा गया। हालांकि समाजवादी पार्टी ने गठबंधन से अलग होने की बात नहीं कही। [outlookindia.com], [indiatoday.in]
गठबंधन पर सार्वजनिक बयान: इसके बावजूद अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से कहा है कि INDIA गठबंधन कायम है और उनकी पार्टी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने के पक्ष में है। [timesofind...atimes.com]
संक्षेप में, मतभेद रणनीतिक और चुनावी हैं, वैचारिक या गठबंधन तोड़ने वाले नहीं। फिलहाल समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों INDIA गठबंधन का हिस्सा हैं।[timesofind...atimes.com], [thenewsmill.com]
कांग्रेस नेतृत्व उत्तर प्रदेश में सीटों के बंटवारे पर जल्द समझौता चाहता है, जबकि SP जल्दबाज़ी में निर्णय लेने के पक्ष में नहीं दिख रही। [livemint.com], [outlookindia.com]
कांग्रेस के कुछ नेताओं के बयानों पर SP ने नाराज़गी जताई है, जिससे दोनों दलों के बीच राजनीतिक खींचतान की चर्चा बढ़ी है। [indiatoday.in]
इसके बावजूद अखिलेश यादव सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि INDIA गठबंधन "कायम" है और SP गठबंधन के भीतर रहकर चुनाव लड़ने के पक्ष में है। [timesofind...atimes.com]
हाल की INDIA बैठक में SP के प्रतिनिधि मौजूद रहे, जिससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी ने गठबंधन से दूरी नहीं बनाई है। [thenewsmill.com]
निष्कर्ष: SP और कांग्रेस के रिश्तों में इस समय "सहयोग भी, प्रतिस्पर्धा भी" वाली स्थिति है। गठबंधन बना हुआ है, लेकिन उत्तर प्रदेश में सीट बंटवारे और नेतृत्व की भूमिका को लेकर बातचीत कठिन चल रही है।[timesofind...atimes.com], [indiatoday.in], [livemint.com]
संक्षिप्त उत्तर: हाँ, सैद्धांतिक रूप से गठबंधन टूट सकता है, लेकिन अभी उपलब्ध जानकारी के आधार पर ऐसा होना तय या निकट भविष्य में निश्चित नहीं दिखता।
आज (1 अक्टूबर 2026) तक की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार:
अखिलेश यादव ने साफ कहा है कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन बरकरार है और दोनों 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव साथ लड़ेंगे। [deccanherald.com]
हालांकि, सीट बंटवारे पर मतभेद अभी भी बने हुए हैं। कांग्रेस "सम्मानजनक हिस्सेदारी" चाहती है और जल्द सीट-शेयरिंग फॉर्मूला तय करने पर जोर दे रही है। [deccanherald.com], [outlookindia.com]
INDIA गठबंधन की 30 सितंबर की बैठक में अखिलेश यादव शामिल नहीं हुए, जिससे अटकलें बढ़ीं, लेकिन SP ने प्रतिनिधि भेजे और कांग्रेस नेताओं ने गठबंधन को मजबूत बनाए रखने की बात कही। [socialnews.xyz], [thehindu.com]
निष्कर्ष: फिलहाल गठबंधन टूटने की कोई आधिकारिक घोषणा या ठोस संकेत नहीं है। वास्तविक स्थिति यह है कि गठबंधन कायम है, लेकिन सीट बंटवारे को लेकर कड़ा मोलभाव चल रहा है। आने वाले हफ्तों में SP और कांग्रेस नेतृत्व की बातचीत से तस्वीर और साफ होगी। [deccanherald.com], [outlookindia.com], [newindianexpress.com]
भारतीय राजनीति में अखिलेश यादव की जगह एक प्रमुख विपक्षी नेता और उत्तर प्रदेश की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक की है।
उनकी राजनीतिक स्थिति को इस तरह समझा जा सकता है:
अखिलेश यादवसमाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, जो उत्तर प्रदेश की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों में से एक है।
वे उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इसलिए उनके पास प्रशासनिक अनुभव भी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में SP ने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया, जिससे अखिलेश यादव की राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका और मजबूत हुई। INDIA गठबंधन में भी वे प्रमुख चेहरों में गिने जाते हैं। [deccanherald.com], [thehindu.com]
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य है। इसलिए यहां मजबूत जनाधार रखने वाला नेता राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
वर्तमान में वे भाजपा के खिलाफ विपक्षी राजनीति के प्रमुख नेताओं में से हैं, साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों के लिए भी महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। [deccanherald.com], [socialnews.xyz]
निष्पक्ष राजनीतिक आकलन में कहा जा सकता है कि अखिलेश यादव आज:
उत्तर प्रदेश में शीर्ष विपक्षी नेताओं में हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख विपक्षी चेहरों में शामिल हैं।
भविष्य में प्रधानमंत्री पद के दावेदारों की चर्चाओं में कभी-कभी उनका नाम लिया जाता है, लेकिन वर्तमान समय में वे मुख्यतः उत्तर प्रदेश की राजनीति पर केंद्रित दिखाई देते हैं।
कुल मिलाकर, उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उत्तर प्रदेश में उनका जनाधार है, और वही उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली बनाता है।
अखिलेश यादव की राष्ट्रीय भूमिका को समझने के लिए उनकी ताकत, सीमाएँ और राजनीतिक महत्व तीनों को देखना होगा।
1. राष्ट्रीय राजनीति में उनकी ताकत
अखिलेश यादव भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के प्रमुख विपक्षी नेता हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति राष्ट्रीय सत्ता को प्रभावित करती है, इसलिए उनका प्रभाव राज्य से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर तक जाता है।
समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भले कांग्रेस या भाजपा जैसी सर्वव्यापी पार्टी न हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में उसका मजबूत जनाधार उसे राष्ट्रीय गठबंधनों में महत्वपूर्ण बनाता है।
INDIA गठबंधन में वे उन नेताओं में गिने जाते हैं जिनके पास वास्तविक वोट आधार और संगठन दोनों हैं। [deccanherald.com], [thehindu.com]
2. विपक्षी राजनीति में उनकी भूमिका
वे भाजपा विरोधी राजनीति के प्रमुख चेहरों में हैं।
उनकी राजनीति सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्ग, दलित और अल्पसंख्यक समूहों के प्रतिनिधित्व पर आधारित रही है।
हाल के बयानों में उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाए रखने की बात कही है, जिससे संकेत मिलता है कि वे विपक्षी एकता को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं। [deccanherald.com], [outlookindia.com]
3. उनकी सीमाएँ
उनका मुख्य प्रभाव अभी भी उत्तर प्रदेश तक केंद्रित है।
दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर, पश्चिम भारत या अन्य बड़े राज्यों में उनकी पार्टी का स्वतंत्र प्रभाव सीमित है।
राष्ट्रीय नेतृत्व की दौड़ में उनकी स्थिति मजबूत होने के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश से बाहर भी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ानी होगी।
4. क्या वे राष्ट्रीय नेता हैं?
हाँ, लेकिन उनकी श्रेणी को "क्षेत्रीय आधार वाले राष्ट्रीय नेता" कहना अधिक उचित होगा।
उन्हें उसी समूह में रखा जा सकता है जिसमें समय-समय पर ममता बनर्जी, एम.के. स्टालिन, उद्धव ठाकरे या तेजस्वी यादव जैसे नेता आते हैं। ये नेता अपने राज्यों में मजबूत हैं और राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते हैं, लेकिन पूरे देश में समान प्रभाव नहीं रखते।
5. भविष्य की संभावनाएँ
यदि:
उत्तर प्रदेश में SP मजबूत प्रदर्शन करती है,
कांग्रेस के साथ गठबंधन सफल रहता है,
और वे विपक्षी एकता में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं,
तो उनकी राष्ट्रीय भूमिका और बढ़ सकती है। वर्तमान स्थिति में उन्हें विपक्ष के प्रमुख रणनीतिक नेताओं में गिना जाता है, लेकिन उन्हें सर्वमान्य राष्ट्रीय नेता या प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में स्थापित कहना अभी जल्दबाज़ी होगी।
निष्कर्ष:अखिलेश यादव आज भारतीय राजनीति में एक प्रभावशाली क्षेत्रीय शक्ति और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विपक्षी नेता हैं। उनकी राष्ट्रीय ताकत का आधार उत्तर प्रदेश है, और वही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी भी है। [deccanherald.com], [outlookindia.com], [thehindu.com]
**राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का भारतीय संविधान के प्रति रुख ऐतिहासिक रूप से आलोचनात्मक रहा है, लेकिन बाद में इसमें बदलाव भी हुआ है।** यह विषय राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। यहाँ तथ्यों पर आधारित सारांश प्रस्तुत है, दोनों पक्षों के दृष्टिकोण के साथ। ### ऐतिहासिक आलोचना (1949–1960 के दशक) संविधान सभा द्वारा संविधान अपनाने (26 नवंबर 1949) के कुछ दिन बाद RSS के मुखपत्र *Organiser* (30 नवंबर 1949) में संपादकीय छपा जिसमें कहा गया कि नए संविधान में “प्राचीन भारत के अद्वितीय संवैधानिक विकास” का कोई उल्लेख नहीं है। इसमें मनुस्मृति की प्रशंसा की गई और कहा गया कि वह दुनिया भर में प्रशंसा का विषय है, लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसे नजरअंदाज किया। RSS के दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक *Bunch of Thoughts* (1966) में लिखा कि संविधान पश्चिमी देशों के विभिन्न संविधानों के अनुच्छेदों का “बोझिल और विषम संयोजन” मात्र है, जिसमें “अपना कुछ भी नहीं” है। उन्होंने एकरूप राष्ट्र और एकात्मक शासन व्यवस्था पर जोर दिया। कुछ आलोचक और विपक्षी दल इसे “संविधान पर हमला” या अस्वीकार कहते हैं। वे मनुस्मृति के पक्ष में बयानों और तिरंगे पर शुरुआती आपत्तियों का हवाला देते हैं। ### बाद में बदलाव और वर्तमान रुख 1948 में गांधी हत्या के बाद RSS पर प्रतिबंध लगा। प्रतिबंध हटाने की शर्तों में संविधान और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति निष्ठा व्यक्त करने की बात शामिल थी। 1949 में RSS ने अपना संविधान अपनाया जिसमें भारतीय संविधान और ध्वज के प्रति निष्ठा का उल्लेख किया गया। आधुनिक काल में: - वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने कई बार कहा है कि संविधान देश की आम सहमति (consensus) है और इसका पालन सबका कर्तव्य है। उन्होंने गोलवलकर की कुछ पुरानी बातों से दूरी भी बनाई है। - RSS/BJP पक्ष कहता है कि वे संविधान के रक्षक हैं। आपातकाल (1975-77) के दौरान RSS स्वयंसेवकों ने लोकतंत्र की रक्षा में भूमिका निभाई। वे प्रस्तावना में 1976 में जोड़े गए “सेक्युलर” और “सोशलिस्ट” शब्दों पर चर्चा चाहते हैं, क्योंकि ये मूल संविधान में नहीं थे। ### दोनों दृष्टिकोण - **आलोचकों का पक्ष**: RSS शुरू से ही संविधान को पश्चिमी, हिंदू-विरोधी या अपर्याप्त मानता रहा। कुछ ने इसे मनुस्मृति आधारित व्यवस्था से बदलने की बात कही। विपक्ष इसे “हमला” या मूल्यों (समानता, धर्मनिरपेक्षता) के खिलाफ बताता है। - **समर्थकों का पक्ष**: आलोचना वैचारिक मतभेद थी, न कि संविधान को नष्ट करने का प्रयास। बाद में RSS ने स्पष्ट रूप से संविधान के प्रति निष्ठा जताई। आज वे इसे राष्ट्रीय दस्तावेज मानते हैं और बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चाहते हैं। **निष्कर्ष**: ऐतिहासिक रूप से RSS ने संविधान की कुछ विशेषताओं (पश्चिमी प्रभाव, संघीय ढांचा, मनुस्मृति का अभाव) पर कड़ी आलोचना की। इसे कई लोग “हमला” मानते हैं। वर्तमान में आधिकारिक रुख संविधान के प्रति निष्ठा का है, हालांकि कुछ शब्दों या प्रावधानों पर बहस जारी रहती है। तथ्य सार्वजनिक रिकॉर्ड (Organiser के पुराने अंक, गोलवलकर की पुस्तक, आधिकारिक बयान) पर आधारित हैं। पूर्ण संदर्भ के लिए मूल स्रोत देखें। यह विषय व्याख्या पर निर्भर करता है।
**हाँ, फारवर्ड प्रेस (Forward Press) में उपलब्ध है।** फारवर्ड प्रेस ने **ललई सिंह यादव केस : सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हिंदी अनुवाद** शीर्षक से 16 सितंबर 1976 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले (उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ललई सिंह यादव) के प्रासंगिक अंशों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है। ### मुख्य लिंक:
इस लेख में फैसले का परिचय और हिंदी अनुवाद दिया गया है। पूरा विस्तृत अनुवाद फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक **‘ई.वी. रामासामी पेरियार : दर्शन-चिंतन और सच्ची रामायण’** में भी संकलित है। इसके अलावा फारवर्ड प्रेस पर इस विषय से जुड़े कई अन्य लेख भी हैं, जैसे: - ललई सिंह यादव ने कैसे यह लड़ाई जीती - पेरियार और अंबेडकर की किताबों पर संघर्ष संबंधी लेख आप उपरोक्त लिंक पर जाकर हिंदी अनुवाद पढ़ सकते हैं।
ललई सिंह यादव की सच्ची रामायण पर सर्वोच्चन्यायालय का फैसला दीजिए ?
**उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ललई सिंह यादव (State of Uttar Pradesh vs. Lalai Singh Yadav), आपराधिक अपील संख्या 291 ऑफ 1971, निर्णय तिथि: 16 सितंबर 1976 (1977 AIR 202, 1977 SCR (1) 616, 1976 SCC (4) 213)।**
यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला है जिसमें तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ (न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर, न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति एस. मुर्तज़ा फ़ज़ल अली) ने सर्वसम्मति से उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज कर दी।
### पृष्ठभूमि
- ललई सिंह यादव ने पेरियार ई.वी. रामासामी की पुस्तक *The Ramayana: A True Reading* (अंग्रेजी) का हिंदी अनुवाद *सच्ची रामायण* नाम से 1968 में प्रकाशित किया था।
- उत्तर प्रदेश सरकार ने दिसंबर 1969 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 99-A के तहत अंग्रेजी और हिंदी दोनों संस्करणों को जब्त (forfeit) करने का अधिसूचना जारी की। सरकार का दावा था कि पुस्तक जानबूझकर और दुर्भावनापूर्वक हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली है (IPC की धारा 295-A के तहत दंडनीय)। अधिसूचना के साथ आपत्तिजनक अंशों की सूची (appendix) लगाई गई थी।
- ललई सिंह यादव ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। विशेष खंडपीठ ने 19 जनवरी 1971 को बहुमत से जब्ती आदेश रद्द कर दिया, क्योंकि सरकार ने धारा 99-A के अनुसार अपनी राय के **आधार (grounds)** स्पष्ट रूप से नहीं बताए थे। जब्त प्रतियां वापस करने और खर्च देने का आदेश दिया गया।
- सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति से अपील की।
### सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य फैसला
न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और अपील खारिज कर दी। मुख्य बिंदु:
- **धारा 99-A के तीन अनिवार्य तत्व** हैं: (1) पुस्तक/दस्तावेज में आपत्तिजनक सामग्री हो, (2) वह सामग्री वर्गों के बीच शत्रुता/घृणा बढ़ाने वाली या धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने वाली हो, और (3) सरकार अपनी राय के **आधार स्पष्ट रूप से बताए**।
- “Stating the grounds of its opinion” अनिवार्य है। केवल appendix में पेज/लाइनों का उल्लेख पर्याप्त नहीं। आधार निहित (implied) मानकर काम नहीं चल सकता। आदेश संक्षिप्त हो सकता है, लेकिन खाली (blank) नहीं।
- आधार न बताने से प्रभावित पक्ष का धारा 99-C के तहत उच्च न्यायालय में समीक्षा का अधिकार बेकार हो जाता है, क्योंकि न्यायालय केवल बताए गए आधारों की जांच कर सकता है।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19) पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून का कठोर (strict) निर्वचन होना चाहिए। आधार न बताना “lethal sin” है और इससे सरकार को मनमानी शक्ति मिल सकती है।
- न्यायालय ने पुस्तक की सामग्री पर गुण-दोष के आधार पर कोई राय नहीं दी कि वह वास्तव में आपत्तिजनक है या नहीं। उसने स्पष्ट कहा कि सरकार उचित आधार बताकर नया वैध आदेश जारी कर सकती है।
न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र में विचारों की स्वतंत्रता पर जोर दिया, साथ ही सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा की आवश्यकता भी स्वीकार की।
**संक्षेप में**: सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रियात्मक दोष के आधार पर जब्ती आदेश रद्द रखा। यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी शक्ति के दुरुपयोग से बचाव के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है। पुस्तक पर प्रतिबंध प्रक्रियात्मक रूप से अवैध पाया गया, न कि सामग्री के गुण-दोष पर।
पूर्ण पाठ भारतीय कानूनी साइटों (जैसे Indian Kanoon या Casemine) पर उपलब्ध है।
ऐसा क्यों हो रहा है कि अपने बयान से मुलायम सिंह यादव बार बार विवादों के शिकार हो जाते हैं यहाँ पर दो बातें बहुत ही प्रमुखता दीखती हैं जिनमें जिम्मेदार अधिकारियों की कमी प्रमुख है, नेता जी के राज्य में जिस तरह से गुंडों और अपराधियों को राज्य का संरक्षण प्राप्त है वे सरकार के प्रति वफादार नहीं हैं जबकि बसपा ऐसे अपराधियों को इसी शर्त पर अपनी सरकार या पार्टी में रखती है की वो पार्टी और सरकार के प्रति वफादार रहेंगे जबकि आज की स्थिति अलग है सरकार के नामपर सभी दलों के अपराधी सपाई बन दोहन कर रहे हैं, अत्याचार कर रहे हैं उन अधिकारियों की सुनी ही नहीं जा रही है जो इस सरकार के प्रति वफादार और ईमानदार हैं, कमोबेश यही हाल सरकार में बैठे मंत्रियों का है, पार्टी कार्यकर्ताओं का है. अभी नए जिलाध्यक्षों का चयन हुआ है जिनमें अधिकाँश ऐसे हैं जिनकी न तो कोई व्यक्तिगत छवि है और न ही कोई वैचारिक पहचान, जाती के नाम पर यह सरकार बदनाम होती जबकि जिस जातीय बदनामी का इसपर आरोप लगता है उसमें नेताजी के परिवार को छोड़ दिया जाय तो इस सरकार से हर वह यादव दुखी है जो ज़रा सा भी स्वजातीय सोच का है, बेईमानों की अगर जाती से ही पहचान होती तो उसमें कम से कम यादव का नाम न आता.
जबकि इतनी समर्पित और जुझारू और न्याय प्रिय जाती को जिस तरह से समाज, जातियां, मीडिया, अधिकारियों और नेताओं ने घेर रखा है उससे बचाना / बचना सपा की मौजूदा स्थिति की शक्ल (सांगठनिक स्वरुप) से नहीं दीखता । क्योंकि जिस राजनैतिक प्रतिबद्धता की आज जरुरत है उसके लिए प्रतिबद्धता और वैचारिक सोच की भी जरुरत है. राजनेताओं और मंत्रियों का आकलन कौन करेगा, लोकसभा चुनाओं को लेकर जिस तरह सरकार से कसरत करवाई गयी सब व्यर्थ ही तो गयी है। जबकि ये स्पष्ट ही था कि नेताजी या उनकी पार्टी प्रदेश के लिए कोई ऐसा काम नहीं कर रही है जिससे प्रदेश के लोग उन्हें देश चलाने के योग्य समझते।
युवा मुख्यमंत्री और कांग्रेस के युवराज जिस तरह से 'चापलूसों' से घिरे हैं वो अब इस देश को या इस देश की राजनैतिक सत्ता के लिए फिट नहीं हो सकते क्योंकि न तो इनकी नीतियों में कोई नीति है ही देश की खुशहाली का सपना और न ही इनके पास वैचारिक प्रतिबद्धता के लोगों की आवश्यकता है और ये घाटियां और देशद्रोही ताकतों के कब्जे में हैं जो इन्हे खुली वैचारिक प्रतिबद्धताओं से जोड़ती हों। जिनके पास वैचारिक विकासशील और कर्मठ कुशल प्रशासकों की टीम हो, जहाँ इस तरह के नियामक नहीं होंगे वहां लूट और खसोट का ही साम्राज्य तो बनेगा अतः यह गीत गाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है ;
राम नाम की लूट है - लूट सके तो लूट
यही कारण है की नेताजी की समग्र समाजवादी सोच का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।
रेप संबंधी बयान पर फिर विवाद में फंसे मुलायम
लखनऊ, एजेंसी
रेप संबंधी अपने बयान से मुलायम सिंह यादव फिर विवाद में फंस गए हैं। मुलायम ने कहा कि उत्तर प्रदेश की आबादी को देखते हुए यहां बलात्कार की घटना कम होती है।
सपा प्रमुख यादव के बयान की कड़ी निन्दा करते हुए भाजपा ने कहा कि वह अपने बेटे और राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बचाव में मुलायम कुतर्क दे रहे हैं।
भाजपा प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा कि पूरे देश के आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में बलात्कार, दहेज हत्या और अन्य अपराध अन्य राज्यों के मुकाबले काफी अधिक हो रहे हैं।
उन्होंने सवाल किया, आबादी का ये पैमाना केवल अपराध तक क्यों बाकी मामलों में भी ये पैमाना होना चाहिए। बाकी क्षेत्रों में प्रदेश तरक्की करे, विकास करे और विभिन्न क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन करे, इसे लेकर भी आबादी के हिसाब से पैमाना तय होना चाहिए।
पाठक ने कहा कि दरअसल मुलायम अखिलेश के बचाव में उतरे हैं और कुतर्क कर रहे हैं। बेहतर होता कि वह मुख्यमंत्री को सलाह देते कि जाति, व्यक्ति और मजहब से उठकर सरकार कार्य करती तो अपराध के आंकड़े कम होते और सरकार की छवि भी बच जाती।
उल्लेखनीय है कि लखनऊ के मोहनलालगंज क्षेत्र में एक महिला के साथ कथित गैंगरेप और हत्या को लेकर किये गये सवाल के जवाब में मुलायम ने कहा है कि उत्तर प्रदेश की आबादी काफी अधिक है। यहां 21 करोड़ की जनसंख्या है। यदि इस देश में सबसे कम बलात्कार कहीं होते हैं तो उत्तर प्रदेश में।
मोहनलालगंज जैसी घटनाएं रोकेगी प्रदेश सरकार: शिवपाल
विशेष संवाददाता, राज्य मुख्यालय
लोक निर्माण एवं सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह यादव ने कहा है कि मोहनलालगंज जैसी घटनाएं प्रदेश सरकार रोकेगी। उन्होंने घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि प्रदेश सरकार पीडिता के बच्चों की हर तरह से मदद करेगी।
यादव समाजवादी नेता स्वर्गीय शारदानंद अंचल की 67वीं जयंती समारोह के बाद पत्रकारों से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सपा सरकार बहुत संवेदनशील है और वह ऐसी घटनाएं रोकने के प्रति कृतसंकल्प है। उनकी सरकार के दौरान जितनी भी ऐसी घटनाएं हुई हैं, सभी को वर्कआउट किया गया है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई है।
उन्होंने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के उस बयान से सहमति जताई जिसमें उन्होंने कहा है कि यूपी जितना बड़ा प्रदेश है, उसमें अन्य प्रदेशों के मुकाबले रेप की घटनाएं बहुत कम हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की मंशा है कि प्रदेश में रेप की कोई घटना न होने पाए। बिजली संकट के सवाल पर उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार यूपी को उसके कोटे की पूरी बिजली दे तो बिजली संकट दूर हो जाएगा। बिजली के क्षेत्र में भी प्रदेश सरकार काम कर रही है।
बलात्कार-हत्याकांड: आनन-फानन में कर दिया गया शव का अंतिम संस्कार
लखनऊ, एजेंसी
राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज में पिछले दिनों हुई सामूहिक बलात्कार के बाद नशंस हत्या की शिकार महिला का शव सुरक्षित रखे जाने के जांच अधिकारी के बयान के चंद घंटे बाद कल देर रात उसका आनन-फानन में अंतिम संस्कार कर दिया गया।
मामले की जांच की अगुवाई कर रही अपर पुलिस महानिदेशक सुतापा सान्याल ने शव को सुरक्षित रखे जाने सम्बन्धी बयान दिया था जिसके कुछ ही घंटे बाद देर रात उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया।
पुलिस प्रवक्ता ने शव का अंतिम संस्कार किए जाने की पुष्टि करते हुए बताया कि परिजन ने देर रात यह रस्म पूरी कर दी। यह पूछे जाने पर कि जब अपर पुलिस महानिदेशक ने शव को सुरक्षित रखने की बात कही थी तो परिजन ने किसकी इजाजत से अंतिम संस्कार किया, प्रवक्ता कुछ नहीं बता सके।
अपर पुलिस महानिदेशक सुतापा ने घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद शाम को कहा था कि मृतका के शरीर को जांच के लिये सुरक्षित रखा जाएगा।
जांच का ब्यौरा देने से इंकार करते हुए सुतापा ने कहा था कि अपराध में एक से अधिक व्यक्तियों के शामिल होने की आशंका लगती है। उन्होंने कहा था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 201 के तहत मामला दर्ज किया गया है और पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद धारा 376 और जोड गयी है। मतका के शरीर पर गहरे घाव सहित कुल 12 जख्म हैं।
गौरतलब है कि मोहनलालगंज के बालसिंह खेडा गांव में परसों सुबह एक प्राथमिक विद्यालय के निकट एक महिला का निर्वस्त्र शव बरामद किया गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उससे बलात्कार की पुष्टि की गयी थी।
जिस इलाके से शव बरामद किया गया, उसी के करीब जबरौली गांव में कल अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्विंटन आये थे और उनकी यात्रा के मद्देनजर न सिर्फ सुरक्षा के कडे इंतजाम किये गये थे बल्कि पुलिस के आला अफसर भी एक दिन पहले से वहां मौजूद थे।
सपा के सत्ता में आते ही कानून व्यवस्था बिगड़ जाती
विशेष संवाददाता राज्य मुख्यालय ।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निर्मल खत्री ने कहा है कि समाजवादी पार्टी की सरकार जब-जब प्रदेश में सत्ता में आती है, तब-तब कानून व्यवस्था की स्थिति खराब और बद से बदतर हो जाती है। उन्होंने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के इस बयान पर कि प्रदेश की आबादी को देखते हुए उत्तर प्रदेश में अपराध कम हैं, पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए शनिवार को यहां कहा कि यादव का यह बयान जनता की सुरक्षा एवं संरक्षा के प्रति विशेषकर महिला अपराधों के प्रति उनकी संवेदनशून्यता को दर्शाता है।
समाजवादी पार्टी की सरकार में ऐसी वारदातें इसलिए होती हैं क्योंकि गलत कार्य करने वालों को सत्ता का संरक्षण दिया जाता है। जो अधिकारी गलत कामों का विरोध करते हैं, उन्हें प्रताडि़त किया जाता है और उन पर अनावश्यक दबाव डाला जाता है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा है कि बदायूं, मोहनलालगंज जैसी जघन्य घटनाएं सरकार की संवेदनशून्यता के चलते घटित हुईं। यही नहीं अवैध खनन में लिप्त अपराधियों को भी संरक्षण दिया गया। अधिकारियों व पुलिस अधिकारियों पर सपा के कार्यकर्ताओं द्वारा हमले किये गये, जिसके चलते कानून व्यवस्था खराब हुई।
उन्होंने कहा कि दो वर्ष के शासनकाल में आम जनता में सपा के खिलाफ माहौल व्याप्त है अगर अभी चुनाव हो जाये और सपा दस सीटें भी बचा पायी तो बड़ी बात होगी।