**राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का भारतीय संविधान के प्रति रुख ऐतिहासिक रूप से आलोचनात्मक रहा है, लेकिन बाद में इसमें बदलाव भी हुआ है।** यह विषय राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। यहाँ तथ्यों पर आधारित सारांश प्रस्तुत है, दोनों पक्षों के दृष्टिकोण के साथ।
### ऐतिहासिक आलोचना (1949–1960 के दशक)
संविधान सभा द्वारा संविधान अपनाने (26 नवंबर 1949) के कुछ दिन बाद RSS के मुखपत्र *Organiser* (30 नवंबर 1949) में संपादकीय छपा जिसमें कहा गया कि नए संविधान में “प्राचीन भारत के अद्वितीय संवैधानिक विकास” का कोई उल्लेख नहीं है। इसमें मनुस्मृति की प्रशंसा की गई और कहा गया कि वह दुनिया भर में प्रशंसा का विषय है, लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसे नजरअंदाज किया।
RSS के दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक *Bunch of Thoughts* (1966) में लिखा कि संविधान पश्चिमी देशों के विभिन्न संविधानों के अनुच्छेदों का “बोझिल और विषम संयोजन” मात्र है, जिसमें “अपना कुछ भी नहीं” है। उन्होंने एकरूप राष्ट्र और एकात्मक शासन व्यवस्था पर जोर दिया।
कुछ आलोचक और विपक्षी दल इसे “संविधान पर हमला” या अस्वीकार कहते हैं। वे मनुस्मृति के पक्ष में बयानों और तिरंगे पर शुरुआती आपत्तियों का हवाला देते हैं।
### बाद में बदलाव और वर्तमान रुख
1948 में गांधी हत्या के बाद RSS पर प्रतिबंध लगा। प्रतिबंध हटाने की शर्तों में संविधान और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति निष्ठा व्यक्त करने की बात शामिल थी। 1949 में RSS ने अपना संविधान अपनाया जिसमें भारतीय संविधान और ध्वज के प्रति निष्ठा का उल्लेख किया गया।
आधुनिक काल में:
- वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने कई बार कहा है कि संविधान देश की आम सहमति (consensus) है और इसका पालन सबका कर्तव्य है। उन्होंने गोलवलकर की कुछ पुरानी बातों से दूरी भी बनाई है।
- RSS/BJP पक्ष कहता है कि वे संविधान के रक्षक हैं। आपातकाल (1975-77) के दौरान RSS स्वयंसेवकों ने लोकतंत्र की रक्षा में भूमिका निभाई। वे प्रस्तावना में 1976 में जोड़े गए “सेक्युलर” और “सोशलिस्ट” शब्दों पर चर्चा चाहते हैं, क्योंकि ये मूल संविधान में नहीं थे।
### दोनों दृष्टिकोण
- **आलोचकों का पक्ष**: RSS शुरू से ही संविधान को पश्चिमी, हिंदू-विरोधी या अपर्याप्त मानता रहा। कुछ ने इसे मनुस्मृति आधारित व्यवस्था से बदलने की बात कही। विपक्ष इसे “हमला” या मूल्यों (समानता, धर्मनिरपेक्षता) के खिलाफ बताता है।
- **समर्थकों का पक्ष**: आलोचना वैचारिक मतभेद थी, न कि संविधान को नष्ट करने का प्रयास। बाद में RSS ने स्पष्ट रूप से संविधान के प्रति निष्ठा जताई। आज वे इसे राष्ट्रीय दस्तावेज मानते हैं और बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चाहते हैं।
**निष्कर्ष**: ऐतिहासिक रूप से RSS ने संविधान की कुछ विशेषताओं (पश्चिमी प्रभाव, संघीय ढांचा, मनुस्मृति का अभाव) पर कड़ी आलोचना की। इसे कई लोग “हमला” मानते हैं। वर्तमान में आधिकारिक रुख संविधान के प्रति निष्ठा का है, हालांकि कुछ शब्दों या प्रावधानों पर बहस जारी रहती है।
तथ्य सार्वजनिक रिकॉर्ड (Organiser के पुराने अंक, गोलवलकर की पुस्तक, आधिकारिक बयान) पर आधारित हैं। पूर्ण संदर्भ के लिए मूल स्रोत देखें। यह विषय व्याख्या पर निर्भर करता है।
