मंगलवार, 8 सितंबर 2026

राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का भारतीय संविधान पर हमला ?


 **राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का भारतीय संविधान के प्रति रुख ऐतिहासिक रूप से आलोचनात्मक रहा है, लेकिन बाद में इसमें बदलाव भी हुआ है।** यह विषय राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। यहाँ तथ्यों पर आधारित सारांश प्रस्तुत है, दोनों पक्षों के दृष्टिकोण के साथ।
### ऐतिहासिक आलोचना (1949–1960 के दशक)
संविधान सभा द्वारा संविधान अपनाने (26 नवंबर 1949) के कुछ दिन बाद RSS के मुखपत्र *Organiser* (30 नवंबर 1949) में संपादकीय छपा जिसमें कहा गया कि नए संविधान में “प्राचीन भारत के अद्वितीय संवैधानिक विकास” का कोई उल्लेख नहीं है। इसमें मनुस्मृति की प्रशंसा की गई और कहा गया कि वह दुनिया भर में प्रशंसा का विषय है, लेकिन संविधान निर्माताओं ने इसे नजरअंदाज किया।
RSS के दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने अपनी पुस्तक *Bunch of Thoughts* (1966) में लिखा कि संविधान पश्चिमी देशों के विभिन्न संविधानों के अनुच्छेदों का “बोझिल और विषम संयोजन” मात्र है, जिसमें “अपना कुछ भी नहीं” है। उन्होंने एकरूप राष्ट्र और एकात्मक शासन व्यवस्था पर जोर दिया।
कुछ आलोचक और विपक्षी दल इसे “संविधान पर हमला” या अस्वीकार कहते हैं। वे मनुस्मृति के पक्ष में बयानों और तिरंगे पर शुरुआती आपत्तियों का हवाला देते हैं।
### बाद में बदलाव और वर्तमान रुख
1948 में गांधी हत्या के बाद RSS पर प्रतिबंध लगा। प्रतिबंध हटाने की शर्तों में संविधान और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति निष्ठा व्यक्त करने की बात शामिल थी। 1949 में RSS ने अपना संविधान अपनाया जिसमें भारतीय संविधान और ध्वज के प्रति निष्ठा का उल्लेख किया गया।
आधुनिक काल में:
- वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने कई बार कहा है कि संविधान देश की आम सहमति (consensus) है और इसका पालन सबका कर्तव्य है। उन्होंने गोलवलकर की कुछ पुरानी बातों से दूरी भी बनाई है।
- RSS/BJP पक्ष कहता है कि वे संविधान के रक्षक हैं। आपातकाल (1975-77) के दौरान RSS स्वयंसेवकों ने लोकतंत्र की रक्षा में भूमिका निभाई। वे प्रस्तावना में 1976 में जोड़े गए “सेक्युलर” और “सोशलिस्ट” शब्दों पर चर्चा चाहते हैं, क्योंकि ये मूल संविधान में नहीं थे।
### दोनों दृष्टिकोण
- **आलोचकों का पक्ष**: RSS शुरू से ही संविधान को पश्चिमी, हिंदू-विरोधी या अपर्याप्त मानता रहा। कुछ ने इसे मनुस्मृति आधारित व्यवस्था से बदलने की बात कही। विपक्ष इसे “हमला” या मूल्यों (समानता, धर्मनिरपेक्षता) के खिलाफ बताता है।
- **समर्थकों का पक्ष**: आलोचना वैचारिक मतभेद थी, न कि संविधान को नष्ट करने का प्रयास। बाद में RSS ने स्पष्ट रूप से संविधान के प्रति निष्ठा जताई। आज वे इसे राष्ट्रीय दस्तावेज मानते हैं और बदलाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चाहते हैं।
**निष्कर्ष**: ऐतिहासिक रूप से RSS ने संविधान की कुछ विशेषताओं (पश्चिमी प्रभाव, संघीय ढांचा, मनुस्मृति का अभाव) पर कड़ी आलोचना की। इसे कई लोग “हमला” मानते हैं। वर्तमान में आधिकारिक रुख संविधान के प्रति निष्ठा का है, हालांकि कुछ शब्दों या प्रावधानों पर बहस जारी रहती है। 
तथ्य सार्वजनिक रिकॉर्ड (Organiser के पुराने अंक, गोलवलकर की पुस्तक, आधिकारिक बयान) पर आधारित हैं। पूर्ण संदर्भ के लिए मूल स्रोत देखें। यह विषय व्याख्या पर निर्भर करता है।

सच्ची रामायण पर सर्वोच्चन्यायालय का फैसला



**हाँ, फारवर्ड प्रेस (Forward Press) में उपलब्ध है।**
फारवर्ड प्रेस ने **ललई सिंह यादव केस : सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हिंदी अनुवाद** शीर्षक से 16 सितंबर 1976 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले (उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ललई सिंह यादव) के प्रासंगिक अंशों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है।
### मुख्य लिंक:

इस लेख में फैसले का परिचय और हिंदी अनुवाद दिया गया है। पूरा विस्तृत अनुवाद फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित पुस्तक **‘ई.वी. रामासामी पेरियार : दर्शन-चिंतन और सच्ची रामायण’** में भी संकलित है।
इसके अलावा फारवर्ड प्रेस पर इस विषय से जुड़े कई अन्य लेख भी हैं, जैसे:
- ललई सिंह यादव ने कैसे यह लड़ाई जीती
- पेरियार और अंबेडकर की किताबों पर संघर्ष संबंधी लेख
आप उपरोक्त लिंक पर जाकर हिंदी अनुवाद पढ़ सकते हैं।

ललई सिंह यादव की सच्ची रामायण पर सर्वोच्चन्यायालय का फैसला दीजिए ?

ललई सिंह यादव की सच्ची रामायण पर सर्वोच्चन्यायालय का फैसला दीजिए ?


**उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ललई सिंह यादव (State of Uttar Pradesh vs. Lalai Singh Yadav), आपराधिक अपील संख्या 291 ऑफ 1971, निर्णय तिथि: 16 सितंबर 1976 (1977 AIR 202, 1977 SCR (1) 616, 1976 SCC (4) 213)।**

यह सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला है जिसमें तीन न्यायाधीशों की खंडपीठ (न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर, न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति एस. मुर्तज़ा फ़ज़ल अली) ने सर्वसम्मति से उत्तर प्रदेश सरकार की अपील खारिज कर दी।

### पृष्ठभूमि

- ललई सिंह यादव ने पेरियार ई.वी. रामासामी की पुस्तक *The Ramayana: A True Reading* (अंग्रेजी) का हिंदी अनुवाद *सच्ची रामायण* नाम से 1968 में प्रकाशित किया था।

- उत्तर प्रदेश सरकार ने दिसंबर 1969 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 99-A के तहत अंग्रेजी और हिंदी दोनों संस्करणों को जब्त (forfeit) करने का अधिसूचना जारी की। सरकार का दावा था कि पुस्तक जानबूझकर और दुर्भावनापूर्वक हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली है (IPC की धारा 295-A के तहत दंडनीय)। अधिसूचना के साथ आपत्तिजनक अंशों की सूची (appendix) लगाई गई थी।

- ललई सिंह यादव ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी। विशेष खंडपीठ ने 19 जनवरी 1971 को बहुमत से जब्ती आदेश रद्द कर दिया, क्योंकि सरकार ने धारा 99-A के अनुसार अपनी राय के **आधार (grounds)** स्पष्ट रूप से नहीं बताए थे। जब्त प्रतियां वापस करने और खर्च देने का आदेश दिया गया।

- सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति से अपील की।

### सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य फैसला

न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा और अपील खारिज कर दी। मुख्य बिंदु:

- **धारा 99-A के तीन अनिवार्य तत्व** हैं: (1) पुस्तक/दस्तावेज में आपत्तिजनक सामग्री हो, (2) वह सामग्री वर्गों के बीच शत्रुता/घृणा बढ़ाने वाली या धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने वाली हो, और (3) सरकार अपनी राय के **आधार स्पष्ट रूप से बताए**।

- “Stating the grounds of its opinion” अनिवार्य है। केवल appendix में पेज/लाइनों का उल्लेख पर्याप्त नहीं। आधार निहित (implied) मानकर काम नहीं चल सकता। आदेश संक्षिप्त हो सकता है, लेकिन खाली (blank) नहीं।

- आधार न बताने से प्रभावित पक्ष का धारा 99-C के तहत उच्च न्यायालय में समीक्षा का अधिकार बेकार हो जाता है, क्योंकि न्यायालय केवल बताए गए आधारों की जांच कर सकता है।

- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Article 19) पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून का कठोर (strict) निर्वचन होना चाहिए। आधार न बताना “lethal sin” है और इससे सरकार को मनमानी शक्ति मिल सकती है।

- न्यायालय ने पुस्तक की सामग्री पर गुण-दोष के आधार पर कोई राय नहीं दी कि वह वास्तव में आपत्तिजनक है या नहीं। उसने स्पष्ट कहा कि सरकार उचित आधार बताकर नया वैध आदेश जारी कर सकती है।

न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने फैसले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र में विचारों की स्वतंत्रता पर जोर दिया, साथ ही सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा की आवश्यकता भी स्वीकार की।

**संक्षेप में**: सर्वोच्च न्यायालय ने प्रक्रियात्मक दोष के आधार पर जब्ती आदेश रद्द रखा। यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी शक्ति के दुरुपयोग से बचाव के लिए महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है। पुस्तक पर प्रतिबंध प्रक्रियात्मक रूप से अवैध पाया गया, न कि सामग्री के गुण-दोष पर।

पूर्ण पाठ भारतीय कानूनी साइटों (जैसे Indian Kanoon या Casemine) पर उपलब्ध है।